जहाँ देखो वहीँ बस उसका चहरा ही नज़र में आता है,
कभी खामोशी से, तो कभी मदहोशी से अपने पास बुलाता है,
दूर हू तो घबराता है, और चुमु उसको तो शर्माता है,
कभी आ जाए बाहों में तो , कभी मुझको जुल्फों में छुपता है,
शोखी से तो कभी कातिल अदाओ से, घायल मुझको कर जाता है,
हर रोज....सुहाने सावन सा...ये ख्वाब हमेशा आता है......
Sunday, September 6, 2009
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