Tuesday, January 12, 2010

तेरी चाहत...मेरी मजबूरी

एक झरोखा ही बहुत है तेरे दीदार के लिए
तू नहीं तेरी याद ही सही मेरे प्यार के लिए,

पा लेते तो शायद..इतनी कशिश ना होती आह में,
अब मौसम ख़ुशी का है केवल मेरे इंतज़ार के लिए,

तुझे पाने कि लिए जिए और...जीते रहे,
कभी चाहत में खुश हुए....तो कभी विरहा के आंसू पीते रहे,

सजा दिया तेरा आंगन.... बगिया के सारे फूलों से,
अब एक फूल नहीं बाकी....खुद की मजार के लिए !!!

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